मंगलवार, 2 सितंबर 2025

उम्मीदों के किरण



उम्मीदों के किरण


कभी-कभी थक सा जाता हूं मैं 
जिन्दगी की इस रफ्तार से
क्षण भर के लिए रुक सा जाता हूं मैं
अपने हर उस मकसद से जो कभी बचपन में मेरी
इन नन्ही आंखों ने देखी थी ।।


तंग आ गया हूं मैं अपनी हर लापरवाही से
टूट सा गया हूं मैं अपनी हर असफलता से
सहम सा जाता हूं कभी
पता नहीं क्यों इस तरह
मानो अब भी डर लगता हो मुझे
बदलती दुनिया और बदलते हुए लोगों से


दिन बदले, रात बदले
टिक टिक टिक टिक करती घड़ियों के सुई बदले
बने बनाए इंसान भी बदल गया 
पलभर में मौसम की तरह ।।

सबकुछ बुझ सा गया वक्त की आंधियों में,
पर अबतक बुझा ना पायी किरणें उम्मीदों की.....
बुझा ना पायी किरणें उम्मीदों की ।।

                                   Lakshman Tudu ( written By )



 






 









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