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शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

Indra Gandhi peace prize 2025/इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार 2025

इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार 2025

स्थापना - 1986 में

यह पुरस्कार  भारत के प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी के याद में " इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट" के द्वारा प्रदान किया जाता है।

क्षेत्र - यह पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय शांति , विकास, निरस्त्रीकरण और न‌ई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को बढ़ावा देने के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु दिया जाता है।

पुरस्कार राशि - 1करोड़ नकद पुरस्कार ,  एक ट्राफी और प्रशस्ति पत्र दिया है।

Note :- पहले इसकी राशि 25 लाख थी ।

2025 में ग्राका माशेल ( मानवाधिकार कार्यकर्ता) को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है। ( * ग्राका माशेल मोज़ाम्बिक देश की रहने वाली है।)


अबतक प्राप्त किसी भारतीय संस्था या व्यक्तियों की सूची जिसे "इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार" प्राप्त है:- 

• IMA ( Indian Medical Association) And TNAI ( Trained Nurses Association of India) - 2022

NGO PRATHAM ( 2021)

Centre For Science And Environment ( 2018 )

डॉ. मनमोहन सिंह ( 2017 )

ISRO (  Indian Space Research Organisation) - 2014 

Ela Bhatt (2011) 

M.Swaminathan (1999)

Rajiv Gandhi ( 1991) 

कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:- 

* प्रथम विजेता - वैश्विक कारवाई के लिए संसद

* प्रथम व्यक्ति - मिखाईल गोर्बाचेव

* प्रथम भारतीय विजेता - राजीव गांधी

* UNICEF ( 1989)  और UNHCR ( 2015) को भी यह

 पुरस्कार प्रदान किया गया है।


                               Written By ( Lakshman Tudu)

      





बुधवार, 3 जून 2020

सचिन तेंदुलकर की एक अनकही कहानी// An Untold Story Behind Sachin Tendulkar//Three Generations one hero








                    



सचिन तेंदुलकर की एक अनकही कहानी


अक्सर हममें से ज़्यादातर लोग कठिन परिस्थितियां के आगे आसानी से हार मान लेते हैं या तो उन परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं क्योंकि शायद हमें सरल जीवन जीने की आदत सी हो गई है या तो हमें उन चुनौतियों को स्वीकार करने से डर लगता हो । यहां पर इसके जवाब हर लोगों के अलग-अलग हो सकते हैं, पर कुछ विरले ही ऐसे होते हैं जो दिखने में तो हम सबकी तरह ही सामान्य होते हैं पर उनकी सोच, साहस और उसकी ज़िद्दीपन उन्हें हम सबसे अलग और खास बनाती है ।

अगर आप इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो आपको आश्चर्य होगा कि ज्यादातर इतिहास इन्हीं लोगों ने रचे हैं ।
किसी ने सच ही कहा है कि समझदार लोग तो केवल रचे हुए इतिहास पढ़ते हैं और इतिहास तो कोई सरफिरा ही रचते हैं ।

सन् 1989 का  वो दिन भला कौन भूल सकता है जहां दो सरहदों की सम्मान "दांव" पर लगी हुई थी ।
दोनों ही देश एक दूसरे को पछाड़ने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते थे । वैसे तो ये दोनों ही सरहद आपस में भाईचारा या समझौता का रास्ता आसानी से अपनाना पसंद नहीं करते और इनकी हर फैसला
 "बन्दूक की नोक" या गोला-बारूद से ही होती थी पर आज इनकी फैसला इन सबसे अलग " क्रिकेट के मैदानों "  पर हो रही थी और वो भी बल्ले और गेंद से हो रही थी ।

इन दोनों देशों की लोकप्रियता क्रिकेट के मैदान में इतनी ज्यादा है कि लोग इनकी तुलना "एशेज" जैसी बड़ी सीरीज से भी करने लगते हैं । अब, आप सब समझ ही गए होंगे कि मैं किन दो देशों की बात कर रहा हूं ।
जी हां.... मैं भारत और पाकिस्तान क्रिकेट की उस भयानक घटना की बात कर रहा हूं जहां विपरीत परिस्थितियों के बीच एक चमकता हुआ "सितारा" ने जन्म लिया था


भारत और पाकिस्तान का वह टेस्ट मैच जिसमें पाकिस्तान की ओर से वकार यूनुस, वसीम अकरम जैसे बड़े दिग्गज खिलाड़ी खेल रहे थे जो उस वक्त उनकी जोड़ी दुनिया के टॉप गेंदबाजों की लिस्ट में गिने जाते थे । उनकी इस जोड़ी के आगे आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड जैसी बड़ी टीमें भी डरती थी क्योंकि उनकी हर गेंदें 150Km/hr - 160/hr की रफ्तार से बल्लेबाजों के सामने आग उगलती हुई आती थी और जिसका सामना करना किसी भी बल्लेबाजों के लिए आसान नहीं था ।
उस टेस्ट मैच का वह आखिरी दिन था और भारत मैच आसानी से हारने के कगार पर था या यूं कहें कि भारत का मैच हारना तय था क्योंकि उनकी आधी से ज्यादा खिलाड़ी पैवेलियन लौट चुकी थी और अगर नवजोत सिंह सिद्धू को छोड़ दिया जाए तो कोई भी ऐसा बल्लेबाज नहीं बचा था जिनके पास ज्यादा अनुभव हो....ऐसे में भारत का हारना लगभग तय हो चुका था ।
एक तरफ जहां भारत की नाज़ुक सी बल्लेबाजों की छोटी सी टुकड़ी थी जिसमें नवजोत सिंह सिद्धू के बाद सिर्फ गेंदबाज बचे हुए थे और दूसरी ओर वसीम अकरम और वकार यूनुस की रफ्तार भरी गेंदों का "खौफ" था ....!!!

तभी महज 16 साल का एक लड़का क्रीज पर आता है और सामने थे वकार यूनुस ।
वकार की पहली गेंद तो किसी तरह निकल जाती है पर 
अगली गेंद पिच पर टप्पा खाकर सीधे उस लड़के के नाक पर जा लगती है और वह बुरी तरह घायल हो जाता है ।
उस वक्त वह महज 16 साल का था जब वह अपनी मौत और जिन्दगी से जंग लड़ रहा था और उनकी लाईव screening  हर घर के TV screen पर दिखाया जा रहा था ।
लोग उनकी जीवन के लिए "रब" से दुआएं मांग रही थी पर वह लड़का अपनी "जिन्दगी" की परवाह किए बिना उन करोड़ों लोगों के लिए मौत से जंग लड़ रहा था जो  cricket को भगवान की तरह पूजते हैं ।
मैंदान के चारों ओर सन्नाटा था और मैदान के बीचों बीच वह लड़का जमीन पर गिरा पड़ा था ।
उनके नाक से खून बह रहा था और वह खून से लूहलूहान हो चुका था और उनके शरीर में इतनी-सी भी शक्ति नहीं थी कि वह अपने पैरों के दम पर उठ खड़ा हो सके ।
तभी कुछ डॉक्टर और खिलाड़ी दौड़कर उनकी मदद के लिए वहां आते हैं और उन्हें आराम करने या रिटायर हर्ट होकर पवेलियन लौट जाने के लिए कहते हैं ।
हर भारतीय दर्शकों की आखिरी उम्मीदें भी टूटती हुई नजर आ रही थी ।
लोग अपनी-अपनी सीटें छोड़कर जाने की तैयारी में थे क्योंकि उन्हें साफ-साफ लगने लगा था कि भारत मैच आसानी से हारने वाला है ।

पर कहते हैं ना कि जिसमें अपने वतन के प्रति प्यार हो वह अपनी खुद की परवाह करने से पहले अपने वतन की परवाह करते हैं और हुआ भी यही.....!!!!
तभी मैदान पर गिरे हुए बेजान सी पड़ी उस लड़के के मुंह से आवाज आई :-
" मैं खेलूंगा.......!!!!"

और वह लड़का एकाएक फिर से क्रीज़ पर खड़ा हो जाता है ।
यह देखकर पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगती है मानो ऐसे लगने लगता है कि एक मुरझाए हुए चेहरों को एक नई मुस्कान मिल गई हो ।
और वकार यूनुस की अगली ही "गेंद" को वह सीमा रेखा के बाहर चार रन के लिए भेजता है और इसबार लोग दुगुनी उत्साह के साथ खड़े होकर उस लड़के की हौसला अफजाई कर रहे थे।
वह लड़का ना सिर्फ वकार, वसीम की गेंदों का डटकर सामना किया बल्कि वह मैच के अंत तक क्रीज पर एक चट्टान की तरह डटे रहे और आखिरकार उसने नवजोत सिंह सिद्धू के साथ 101 रनों की बड़ी साझेदारी करते हुए भारत को हारने से बचाया । इसकी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी कि भारत हारा हुआ मैच भी "ड्रा" खेल सकता है पर उस काम को महज 16 साल के उस लड़के ने कर दिखाया जो उस वक्त किसी ने नहीं कर पाया था ।
भले ही उस वक्त लोगों को यह कोई चमत्कार सा लगे पर वह चमत्कार नहीं हकीकत था जो एक व्यक्ति की अटल निष्ठा और
उसके देश के प्रति प्रेम को दर्शाता है ।

 यह लड़का कोई और नहीं बल्कि सचिन रमेश तेंदुलकर था जो आगे चलकर पूरे विश्वभर में क्रिकेट रिकॉर्डों की अंबार लगा दी और पूरे विश्वभर में  "मास्टर ब्लास्टर"/ "क्रिकेट के भगवान" आदि के नाम से प्रसिद्ध हुआ

अगर वह उस दिन कठिन परिस्थितियों से समझौता कर लेता तो शायद ही देश को कभी कोई सचिन तेंदुलकर मिल पाता ।
इसलिए हर कठिन परिस्थितियों से डरकर भागे नहीं बल्कि उनका डटकर सामना करें क्योंकि कठिन परिस्थितियों में ही हमारी असली "व्यक्तित्व" की असली पहचान होती है ।



तो Friends कैसी थी मेरी आज की ये post कमेंट बॉक्स में कमेंट करके जरूर बताएं और हां post अच्छा लगे तो post को Like और share जरूर करें । 

Thanks.....!!!




                                                 written By 

                                           Lakshman Tudu
















Indra Gandhi peace prize 2025/इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार 2025

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